करमां री खेती

करमां री खेती

Monday, 2 April 2012

ताळौ
(1)
लाय बरसांवतै तावड़ै
जद कोसां ताईं नीं दीसै
ढांढा रौ नांव
इणी बगत
आपरी दीठ बाळतौ
दीस ज्यावै-ताळौ।

(2)
सांसां जमावण वाळै सीयाळै
जद लोथड़ा ताईं धूजै,
गम ज्यावै मिनख,
इणी बगत
सूनै मारग खड़्यौ
दीस ज्यावै-ताळौ।

(3)
हिंयौ हरखावणियै चौमासै
जद बळती बाजै
घाट-घाट हुवै गोठां
इणी बगत भी
कठै नी हालै
खड़्यौ रैवै-ताळौ।

(4)
थनै घड़णियां हाथ
भूलग्या
कियां निभाइजै कौल।
सगळां नै सिखावणनै
सागी ठौड़
ऊभौ रैवै-ताळौ।
अंगद


(1)
अेक बगत
रामजी रै कैयां सूं
बाली रौ बेटौ
ऊभौ, पग रोप’र
‘दस माथा’ आळै सामौ
पण, बौ कोनी सरकाय सक्यौ
अंगद रौ पग
चिणसोक।

(2)
आज सागी रावण
नूंवा माथा लगाय
ऊभौ है,
आपरौ पग रोप’र।
पण, अंगद नीं हिलाय पाय रह्यौ
उण रौ पग,
चिणसोक।
भेळप
(1)
बैठतौ हौ
दादोसा भेळौ
यादां नै उधेड़णनै।
खुलती ही,
अेक-अेक पोर।
अस्सी बरसां री साख मांय सूं
कदै मैकती ही,
यादां री बगीची मांय सूं
गुलाब री डाळ तो
कदै-कदै उतरता हा,
कांदै रा छूतका।

(2)
भागदौड़ अर
पटका-पटकी सूं अळगी
सात जूण री
भूली बिसरी कथावां।
दादीसा भेळा बितायोड़ा
बे पैलड़ा-पैलड़ा पळ।
घूंघटै सूं फूटती डिचकारी
पग-पग माथै
लाज, सरम अर हया।
बड़ै दादोसा रौ अक्खड़पणौ,
नेम-कायदां सूं जींवणौ,
पण फेरू भी
दोय पीढ्यां री चोखी भेळप।

Wednesday, 28 March 2012



दरद

दरद जे पीड़ व्है
तो ओ साधक भी व्है।
साध्य भी व्है।
रगां मांय
दौड़तौ दरद
कैय जावै सै बात्यां
बिना कैया
अर रच ज्यावै
अेक सबदलोक।
जिणरा ऊंडा
अरथ व्है
मीलां दूर
कोरी कळपनावां सूं।
उणा में व्है अेक टीस
अर टीस मांय भी व्है
अेक मजौ।
अेक सुकून।
जकौ आत्मा ने दिरावै
सांति।
जकी कर ज्यावै
काळजै रौ बोझौ हळ्कौ।

अटंगी
(1)
आपरी जांण
जैपर अर दिल्ली ताईं पूगोड़ौ
कुड़छा री छतरछाया
बैठ्यां सोचै
ठोकर खाय’र पडू. कोनी।
पण अठै लूंठी अबखायां।
तनै भाटां सू डर कठै ?
इण मारग तो थारा चेला बैठ्या
अटंगी देय’र पटकण ने।

(2)
आज रा द्रोण
तू तो सिखायौ कोनी
पण अै अेकलव्य
सीखग्या
थारी करतूतां रा फोटू काळजै
लगार, थनै
अटंगी देय’र पटकणौ।

म्हैं तो
(1)
फण, सूंड, पंजा सा सबळा
गायां सा अबळा
चारपाया का घिसीजणिया
रैवै, आभै हेठै भेळा
पण, म्हैं तो..........

(2)
काळजौ चढ़ावती
कूकां रै बिचाळै
बणतां रैवै, अेक दूजै रा
सिराण-दुपारा।
पण ओळमौ नीं
बदळै री ओळी नीं
पण, म्हैं तो..........

(3)
ऊंचै-ऊंचै दिरखतां
अेक न्यारौ बंगलौ बणाय
भूख, तिरस, गरमी, सरदी अर पीड़
काढै
पाँख्यां, चूंच अर पंजां रै सायरै
पण, म्हैं तो..........

(4)
कळ-कळ बैवणिया झरनां सूं
चिणसाक अळगा
ऊग्योड़ा बिरछ
भुजावां पसार’र
रैवणियां ने खेलावै
बांदरां रौ खेल
पण, म्हैं तो..........

Tuesday, 27 March 2012




सांच हुंवतौ दीसै है

घाट-घाट मुळकासी साहित
मोकळौ करसी चानणौ।
मुरधर थारौ मान बधैला
ओळी पड़सी मानणौ।
सींच्यौ इण नै मान बधावण
दिवाकर-देथा जैड़ा लोग।
ठावी ठौड़ दिरावण सारू
बणग्या जोगी छोड्या भोग।
‘राजस्थानी’ थारौ आसण
कितरां दसकां सूं तरसै है।
मुरलीधर पाळ्यौ बौ सुपणौ
अब सांच हुवतौ दीसै है।
आठवीं सूची में भिळणौ
क्रोड़ काळजा हरखावै।
सनमाण बधण री आस पळी
मोत्यां ज्यूं मुरधर पळकावै।
मोत्यां ज्यूं पळ-पळ ओ मुरधर
मरूवाणी रौ मान बधावैला।
‘ढोला मरवण’ वाळौ म्हारौ देस
नित जग मां पूज्यौ ज्यावैला।

बगत

घोर सरणाटे मांय पड़ी
उण री लास
उडीकै
पंचभूतां सूं मिलण सारू।
पण
स्यात उणरौ कोई कोनी
जिणसूं कर सकै
उण री काया अरदास।
उण रै कांनी उठण वाळी
हर अेक संवेदना
क्षण भर री है।
अरे भाई
बखत किण रै कनै है ?
हाँ,
चीलखां, कागला अर कुता
जरूर करसी
उण रौ भक्षण।


लुकमीचणी

आज रै बगत
मिनखां रौ कैवणौ का करणौ
अर
गिरगिट री दीठ
मांय जबर री भेळप।
दोनूं रा दोनूं
बगत कोनी लगावै
लुकमीचणी खेलतां
बदळतै रंगां सूं
हेसपेस करता।